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जयशंकर की खाड़ी कूटनीति

पश्चिम एशिया में तेजी से बिगड़ते हालात और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर कूटनीतिक प्रयासों के केंद्र में आ गए हैं। रविवार, 5 अप्रैल, 2026 को जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष सैयद अब्बास अराघची से फोन पर महत्वपूर्ण चर्चा की। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दी गई 48 घंटे की चेतावनी की समय सीमा समाप्त होने वाली है।

नई दिल्ली और तेहरान के बीच यह संवाद भारत की उस “हेजिंग और डी-रिस्किंग” (Hedging and De-risking) रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों के हितों की रक्षा करना चाहता है। पिछले 24 घंटों में जयशंकर ने यूएई (UAE) के उप प्रधानमंत्री अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान और कतर के प्रधानमंत्री तमीम बिन हमद अल थानी से भी उच्च स्तरीय चर्चा की है।

फोन कॉल: युद्ध की कगार पर खड़ा क्षेत्र

विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, मंत्री अराघची के साथ बातचीत में पश्चिम एशिया के “बदलते हालात” और भारत-ईरान द्विपक्षीय संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया गया। जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा: “ईरान के विदेश मंत्री का फोन आया। वर्तमान स्थिति पर चर्चा की।”

भारत में ईरानी दूतावास ने जानकारी दी कि दोनों नेताओं ने राष्ट्रपति ट्रंप की धमकियों की पृष्ठभूमि में “क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों” पर चर्चा की। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि सोमवार शाम तक हॉर्मुज जलडमरूमध्य—जो दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है—नहीं खोला गया, तो ईरान को “नर्क के समान” परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

2026 का संकट और ‘खामेनेई घटना’

वर्तमान संघर्ष, जिसने वैश्विक तेल की कीमतों को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है, 28 फरवरी, 2026 को शुरू हुआ था। एक संयुक्त अमेरिका-इजराइल सैन्य अभियान में ईरान के 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु हो गई थी। इस अभूतपूर्व हमले ने तेहरान की ओर से एक बड़ी जवाबी कार्रवाई को जन्म दिया, जिसने बाद में फारस की खाड़ी में अमेरिकी संपत्तियों और समुद्री यातायात को निशाना बनाया।

भारत के लिए इस संकट के परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 60% खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है और वहां 85 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी रहते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी बड़े युद्ध का मतलब न केवल वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता होगा, बल्कि यह मानव इतिहास के सबसे बड़े निकासी अभियान (Evacuation) की आवश्यकता को भी जन्म देगा।

जयशंकर का ‘डी-रिस्किंग’ सिद्धांत

शनिवार को आईआईएम रायपुर (IIM Raipur) के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जयशंकर ने भारत की रणनीतिक सोच की झलक दी। उन्होंने वर्तमान वैश्विक उथल-पुथल को “संरचनात्मक” बताया और राष्ट्र से “हेजिंग, डी-रिस्किंग और विविधीकरण” की नीति अपनाने का आह्वान किया।

जयशंकर ने कहा, “आज हर चीज का लाभ उठाया जा रहा है, यहाँ तक कि उसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। दुनिया एक अस्थिर वातावरण में खुद को सुरक्षित रखने की चुनौती का सामना कर रही है। भारत ने घरेलू और बाहरी चुनौतियों का सफलतापूर्वक प्रबंधन करके खुद को मजबूती से साबित किया है।”

रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ‘विश्व बंधु’ के रूप में भारत की भूमिका उसे ट्रंप प्रशासन और ईरानी नेतृत्व दोनों के साथ संवाद करने की अनुमति देती है, जो बहुत कम देश कर सकते हैं।

“भारत उन गिने-चुने वैश्विक शक्तियों में से एक है जिसकी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का सम्मान वॉशिंगटन और तेहरान दोनों जगह किया जाता है,” डॉ. हर्ष वी. पंत (उपाध्यक्ष, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन) ने कहा। “कतर और यूएई के साथ जयशंकर की बातचीत बताती है कि भारत क्षेत्रीय शक्तियों के साथ मिलकर एक ऐसा ‘सुरक्षा घेरा’ बनाने की कोशिश कर रहा है जो इस विस्फोटक माहौल को शांत कर सके।”

कूटनीति या संघर्ष?

जैसे-जैसे ट्रंप की समय सीमा नजदीक आ रही है, नई दिल्ली की कूटनीतिक मशीनरी ओवरटाइम काम कर रही है। यूएई और कतर को किए गए फोन कॉल विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये दोनों देश मध्यस्थ और रसद केंद्र (Logistics Hub) के रूप में कार्य करते हैं।

हालांकि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने “नए फारस की खाड़ी आदेश” की घोषणा की है, लेकिन भारत ने लगातार “संवाद, तनाव कम करने और संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान” की आवश्यकता पर जोर दिया है।

फिलहाल पूरी दुनिया सांसें थामकर देख रही है। क्या जयशंकर की “शांत कूटनीति” ट्रंप की धमकियों और ईरान की अवज्ञा के बीच की खाई को पाटने में मदद कर पाएगी? इसका फैसला अगले 24 घंटों में हो जाएगा। जैसा कि विदेश मंत्री ने रायपुर में कहा था, इन बदलावों को प्रबंधित करने की क्षमता अब केवल एक विदेश नीति विकल्प नहीं है—यह राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए एक आवश्यकता है।

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