ग्राफिक एरा में हिमालयी वस्त्रों पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू
ग्राफिक एरा में हिमालयी वस्त्रों पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू
देहरादून, 23 अक्टूबर। ग्राफिक एरा में विशेषज्ञों ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की पारंपरिक वस्त्र कलाएँ सांस्कृतिक पहचान की धरोहर हैं, जिन्हें आधुनिक तकनीक और टिकाऊ तौर-तरीकों से भविष्य के लिए सहेजा जा सकता है।

ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी में आज हिमालयी वस्त्र: परंपरा, तकनीक और टिकाऊ भविष्य पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हो गई। समारोह में मुख्य अतिथि टेक्सटाइल्स एंड क्लोथिंग रिसर्च सेंटर (टीसीआरसी) अध्यक्ष, डॉ. अनामिका पाठक ने कहा कि असम से लेह-लद्दाख तक फैला हिमालयी क्षेत्र वस्त्र परंपराओं का अनूठा खज़ाना है। पश्मीना, कपास और बिच्छू घास (नेटल) जैसे प्राकृतिक संसाधनों से बने वस्त्र यहीं की पहचान हैं, जिन्हें युवा नवाचार के जरिए नए बाज़ार तक पहुँचा रहे हैं। अरुणाचल, सिक्किम और लद्दाख के वस्त्रों में बौद्ध प्रतीकों की झलक प्राचीन व्यापार मार्गों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान को दर्शाती है। पंजाब, बनारस और पहाड़ी कढ़ाई के बाद यह पहल इसी विरासत को सहेजने का प्रयास है।

कुलपति डॉ तबस्सुम नकवी ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की वस्त्र परंपराएँ समृद्ध संस्कृति, विरासत और शिल्पकौशल की प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि इन परंपराओं को आधुनिक तकनीक, नवाचारी डिज़ाइन और टिकाऊ विकास से जोड़ते हुए सहेजना हमारी जिम्मेदारी है।
हिमालयन हेरिटेज फैशन वॉक में रैंप पर हिमालय की विरासत नए अंदाज़ में उतरी। रोलने उत्सव के पारंपरिक परिधान समकालीन शैली में नज़र आए, जबकि नागालैंड की जनजातीय छापों और बिच्छू घास (नेटल) से बने वस्त्रों ने टिकाऊ फैशन की मिसाल पेश की। उत्तराखंड की हिप-हॉप स्ट्रीटवियर शैली ने युवाओं को खूब लुभाया। कुल्लू की शॉलें और कश्मीरी फेरन फ्यूचरिस्टिक डिज़ाइनों में ढलकर परंपरा को वर्तमान से जोड़ते दिखे।

संगोष्ठी का आयोजन यूनिवर्सिटी के फैशन डिज़ाइनिंग डिपार्टमेंट, टेक्सटाइल्स एंड क्लोथिंग रिसर्च सेंटर और जयपुर के भारतीय शिल्प संस्थान (आईआईसीडी) ने संयुक्त रूप से किया। संगोष्ठी में कुलसचिव डॉ ज्योति छाबड़ा, डीन ऑफ एकेडमिक्स डॉ प्रमोद नायर, श्री राजीव कुमार सोलंकी, डॉ बानी झा, शिक्षक शिक्षिकाएं और छात्र-छात्राएं शामिल हुए।
